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न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।

भरी है दुपहरी बहे जा रहे हैं न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं । चले जा रहे हैं । खड़े पीठ करके भले उस तरफ हों मगर मंजिलों को तके जा रहे हैं। चले जा रहे हैं । … Continue reading

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Posted in ग़ज़ल, दुःख, श्रृंगार/प्रेम | Tagged , , , , , | 8 Comments