तंज़….

कभी दरिया कभी सागर से लगते हैं
नैन पतझड़ से जब बरसते हैं ।

चश्म सजते हैं गुलाबी होकर
तुमको बेरंग बना बैठे हैं ।

रात आई है कितनी बन ठन के
चराग़ बिन जले ही जलते हैं ।

अलाव, सिसकियाँ खयालों की
जिनको ख़ामोशी में समोते हैं ।

उनके गेसू में फूल टेसू के
आग जंगल की आज लगते हैं ।

मुस्कराहट है बस अदाकारी
अश्क़ दिल से मगर निकलते हैं ।

चोर बैठा ज़ुरूर है बाहर
बेकली सारी लेके चलते हैं । (बेचैनी)

एतजाजी में क्या मिला हमको (प्रिय)
दिल के दरिया लहू से बनते हैं ।

इतना मुश्किल है तंज़ करना जो
हम मुहब्बत में ज़ीस्त रखते हैं ॥ (ज़िन्दगी)

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4 Responses to तंज़….

  1. kavita rawat says:

    कभी दरिया कभी सागर से लगते हैं
    नैन पतझड़ से जब बरसते हैं ।
    उनके गेसू में फूल टेसू के
    आग जंगल की आज लगते हैं ।

    .वाह! बहुत सुन्दर गजल ..

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      आभार कविता जी आपके बहुमूल्य समय एवम पृत्युत्तर के लिए.

  2. Pammi simgh says:

    उम्दा ख्यालात एवम् भावपूर्ण शब्द विन्यास..

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      धन्यवाद पम्मी जी आपके सुविचारों के लिए.

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