Category Archives: बाल सुलभ

घोड़ा… कुछ यादें बचपन की

था  मैंने  इक  सपना  देखा सपने  में  था  घोड़ा मटक – मटक  के  चला  कभी  वो कभी  था  सरपट  दौड़ा ….. आँखे  उसकी  कजरारी  थी चल  बड़ी  थी  प्यारी परी  लोक  का  लगता  था वो देखे  दुनिया  सारी ….. नभ  … Continue reading

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Posted in बाल सुलभ | 13 Comments