Author Archives: Pushpendra Singh Gangwar

चलन ज़िन्दगी का

पहिया बताता है चलन ज़िन्दगी का गड्ढों भरी कंकड़ी, पथरीली, साधारण और शानदार ऊंची नीची मखमली घाटियाँ फूलों से भरी सीखता है तमन्नाओं पर काबू करना न बहकना न थिरकना न ही धधकना चड़ता है कोमल राहों पर और टूटे … Continue reading

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बंदगी: तुम्हारे नाम की

बड़ा आसां है कहना बेवफा कहना नहीं लेकिन बंदगी की हो कैसी भी मगर सर तो झुकाया है ॥ लगी है आज भी तुमसे छुपा कर रखी है लेकिन तुम्हे तो है पता सब कुछ कि तुमसे क्या छुपाया है … Continue reading

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कारण

दर्द नहीं है कोई मौका किसी को युहीं जो मिल जाये फूल नदी या हवा का झोंका बस युहीं जो चल जाये फूलों के बिस्तर वाले इसकी कीमत क्या जानेंगे दर्द उसी को मिलता है जो मरते मरते भी जी … Continue reading

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सुनो तो

काली घनेरी बूँद से पूछो क्यों रो दिए इंसान हर तरफ मिला इंसान खो दिए । मंदिर हो या मस्जिद कहीं कलीसा सभी जगह वो तू ही था हर उस जगह, जिसको नज़र किये । ऐसा लगे क्यों तुझमे नहीं … Continue reading

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Posted in ग़ज़ल, जीवन तरंग, दुःख, भक्ति | 6 Comments

कोई तो लौटाए

लौट आते वो पंछी आम कि छावों वही अपना गांव बारिश सा बनी नदिया उसमे लहराती इठलाती नईया पुरानी यादें तोतले यारों कि बातें अपनों का साथ दूर से आती बारात तारों भरी रात माँ का प्यार फिर जोर से … Continue reading

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Posted in भक्ति | 2 Comments

“तो क्या हो ……………”

तेरे पहलू में सर छुपा ले तो क्या हो इस जहाँ को शमशान बना दे तो क्या हो जी नहीं सकते इक पल भी तुम बिन तुझे इस जहाँ से चुरा ले तो क्या हो दामन-ए-वक़्त में है तेरा मिलना वक़्त … Continue reading

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Posted in ग़ज़ल, श्रृंगार/प्रेम | 3 Comments

भीख या माध्यम

ज़िन्दगी मांगती है भीख हर रोज़ खुशियों अरमानो सम्बन्धों पैसो की भी पर सच में पैसो की किसी को जरूरत है क्या …..शायद नहीं ये तो बस माध्यम है बाकी सब पाने का जीत जाने का हार जाने का किसी … Continue reading

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Posted in जीवन तरंग | 10 Comments

मृगमरीचिका

रेगिस्तान की सांद्र उमस में भटके पथिक सा मन कभी यहाँ कभी वहां लक्ष्य के पीछे भागता हर क्षण प्रतिक्षण सामने, बस एक कदम दूर तत्क्षण ही अदृश्य समय की गति सा आगम और निगम ….. रेगिस्तान की झुलसती बारिश … Continue reading

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Posted in जीवन तरंग | 16 Comments

काश…

मुहब्बत में जलाकर आज भी रखे दिये हमने कभी तू लौटकर देखे अँधेरा न मिले घर में॥ ख़ुशी मिलती है, तेरी शोहबतें हासिल नहीं मगर तेरी यादों के हाथो सौंप दी ये ज़िन्दगी हमने ॥ छुपा के रखे है हमने … Continue reading

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कुछ बात करें…

आओ कुछ बात करें सुने सुनाएँ अपने तुम्हारे दिलों की चीखे चिल्लाएं महसूस करें साँसों की जुंबिश हाथों की थिरकन होठों की लरज़ और माथे की शिकन गएँ उन गीतों को जो हमारे थे कोसें उन लम्हों को जो हमारे … Continue reading

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Posted in श्रृंगार/प्रेम | 6 Comments