Author Archives: Pushpendra Singh Gangwar

चुनौती या मंज़िले

चुनौती यहाँ है यहीं मंजिले भी यहाँ के सिवा अब कहा जाऊंगा मैं॥ संवरते संवरते जो किस्मत भी बदली अभी तक चला हूँ चला जाऊंगा मैं ॥ कभी साथ छूटे तो थमना भले हो हिफाज़त में हमको उतरना भले हो … Continue reading

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कोई गिला नहीं

कोई गिला नहीं कोई गिला नहीं कि कोई जानता नहीं अब तो मेरा नसीब भी पहचानता नहीं । घनघोर रात पेड़ की परछाइयों का डर मेरे सिवा कोई भी जिसे मानता नहीं । अधखुली सी नींद हो कि धूप की चटख … Continue reading

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बिन खवाब क्या जीना

ये भी कोई जीना है। ये जीना क्या जीना है ये भी कोई जीना है हर पल सांसे गिनना है हर सांस में आंसू पीना है ये भी कोई जीना है। खोये खवाबों में है लेकिन क्या खवाबों का हमको … Continue reading

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तुम्हारी अमानत

ग़ज़ल जो व्यक्त करती है दर्द और इश्क़ को दिल में दर्द बहुत है लेकर थोड़ा मरहम आ जाओ वक़्त नहीं होगा तुम पर तुम जो है वापस ले जाओ । अश्क़ो की जागीर भरी है थोड़े मोती हैं बाकी … Continue reading

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न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।

भरी है दुपहरी बहे जा रहे हैं न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं । चले जा रहे हैं । खड़े पीठ करके भले उस तरफ हों मगर मंजिलों को तके जा रहे हैं। चले जा रहे हैं । … Continue reading

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ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

क्या हुआ? ऐ  दोस्त… जब से तुमको जाना है, तुम ऐसे न थे । यूँ कैसे बिखर गए, तुम ऐसे न थे । देखा गम से हमेशा दूर, तुम ऐसे न थे । चेहरे पर भोलापन आँखों में चंचलता न … Continue reading

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तन्हाईयाँ

तन्हाइयों की तलाश या किसी कसक की आहट ग़ज़ल इश्क़ या खुद से तार्रुफ़ ज़माने ने कोशिश बहुत की उड़ाने की हम वो परिंदे थे जो पिंजरे में बंद थे कभी तो गुजारिश नवाजिश से महकेगी वरना ज़िन्दगी तनहा तो … Continue reading

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प्यार

कुछ बातें उन शहीदों के मुख से !!! जाने कितने संसार बिखर गए माता तेरे प्यार में जाने कितने लाल गुजर गए माता तेरे प्यार में गुज़र गए और बिखर गए जो फूल चुने थे प्यार से आँचल के तेरे रंग … Continue reading

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तंज़….

कभी दरिया कभी सागर से लगते हैं नैन पतझड़ से जब बरसते हैं । चश्म सजते हैं गुलाबी होकर तुमको बेरंग बना बैठे हैं । रात आई है कितनी बन ठन के चराग़ बिन जले ही जलते हैं । अलाव, … Continue reading

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जीवन क्या है…..

जीवन क्या है जीवन क्या है ओस की बूँदें बूंदों जैसी रंग बिरंगी रंग हों जैसे इंद्रधनुष के तृष्णा इसकी पुष्पक सुगंध सी शीतल मद्धम पावन ज्योति पावन जैसे धूप दिया हो मधु प्रसाद सा दिया गया हो जीवन क्या … Continue reading

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