हम लोग !

हम लोग
रोते, चीखते, लड़ते. पिटते और हँसते
धूल आँधी पानी और तूफ़ान
सब बेकार
हम हमेशा
अपने में मगन
कभी यहाँ कभी वहां जाने कहाँ
बसंत, सर्दी, गर्मी या बरसात
चिकने घड़े से हम
कभी लड़े फिर उठे और फिर लड़े
फिर भी
साथ रहते और प्यार से रहते
इसीलिए हम प्रकृति की सबसे अनमोल रचना हैं
न की तुम्हारी तरह
हमेशा अपनों का गला काटते
न प्रेम न आदर बस स्वार्थ ही स्वार्थ
न रिश्ते न नाते
सब अपने लेकिन बेगाने
तुमने हमसे सीखा तो सिर्फ लडना
पर शायद
अभी तुम्हे हमसे बहुत कुछ सीखना है
प्रेम, प्यार, स्नेह और भावना
जो शायद कहीं खो गया है
कहने को हम बन्दर हैं
शायद तुमसे कहीं बेहतर हैं
लेकिन तुम क्या हो इंसान
फिर क्यों ………

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Written on 1 Mar 2003

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4 Responses to हम लोग !

  1. Vivek says:

    good one

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