बंदगी: तुम्हारे नाम की

बड़ा आसां है कहना बेवफा कहना नहीं लेकिन
बंदगी की हो कैसी भी मगर सर तो झुकाया है ॥

लगी है आज भी तुमसे छुपा कर रखी है लेकिन
तुम्हे तो है पता सब कुछ कि तुमसे क्या छुपाया है ॥

नहीं कोई है मेरी ज़िद चलें साँसे तुम्हारे बिन
वजह पूछी कभी इनसे तुम्हारा नाम आया है ॥

हमें मालूम है तुम भी परेशां हो जुदा होकर
तुम्हारे एक आंसू ने हमें दोज़ख दिखाया है ॥

तसव्वुर है हमें हासिल ज़माने भर की नेमतें
लुटाकर सारी दुनिया को तुम्हें अपना बनाया है ॥

कभी थी आरज़ू हमको दरकते से सितारे की
तुम्हे मेरा ख़ुदा लेकिन ख़ुदा ने खुद बनाया है ॥

तुम्हारी याद भी देखो ख़ज़ाने से नहीं है कम
किसी को ना पता हो सच, लबों ने मुस्कुराया है ॥

बंदगी की हो कैसी भी मगर सर तो झुकाया है ॥

—— १८ मई २०१६

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10 Responses to बंदगी: तुम्हारे नाम की

  1. Pammi singh says:

    Khubsurat bhav awam abhivaykti…

  2. Tarun says:

    bahoot khoob!!!

  3. Navin says:

    Bahut he khoob soorat sir nice ?

  4. avnesh kumar says:

    Bahut khoob

  5. dnaswa says:

    बहुत खूबसूरत हैं सभी शेर … उनको खुदा आपने ही बनाया है … ग़ज़ल तो ये कह रही है …

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      आभार नासवा जी आपके बहुमूल्य समय एवं प्रत्युत्तर के लिए…

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