पुष्प, दीप्ति – एक नया संसार

सोचा था क्या बनेंगे हम
बने दीप्ति या बने सुमन
दीप्ति बने तो जलन साथ में
सुमन बने तो मिले चुभन
सोचा था क्या बनेंगे हम

दीपक बनकर आग लगा दे
इस दुनिया को खाक बना दे
जी भर साथ में शूल मिलेंगे
तो क्यों ऐसा बने चमन
सोचा था क्या बनेंगे हम

मन में आया साथ मिला दे
पूजा का इक थाल बना दे
सृष्टि का विश्वास बनाकर
उस ईश्वर को करें नमन
सोचा था क्या बनेंगे हम

उस गर्मी को दिया बनाकर
अपने अंतर्मन में बसा ले
प्रभु चरणों का नेह मिलकर
पुष्प दीप्ति का हो संगम
सोचा था क्या बनेंगे हम
अब तो बस यही बनेंगे हम ।

written on 09/06/2007

Share
This entry was posted in जीवन तरंग. Bookmark the permalink.

12 Responses to पुष्प, दीप्ति – एक नया संसार

  1. Rajarapu Souri Raju says:

    Like it

  2. Rohit says:

    Good one

  3. Tarun says:

    Good one

  4. Vivek says:

    Behtreen

  5. ram says:

    Bahetreen kalpana hai

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      क्षमा करें रामनरेश जी ये कल्पना नही है… वरन वस्तिवक्ता है जो महसूस की गयी है

  6. जय मां हाटेशवरी…
    अनेक रचनाएं पढ़ी…
    पर आप की रचना पसंद आयी…
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें…
    इस लिये आप की रचना…
    दिनांक 14/06/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है…
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।
    अगर आपने ब्लौग follow नहीं किया है तो….इसे follow भी करें….

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      आभार कुलदीप जी… बस आप जैसे सहयोगियों का स्नेह है और माँ शारदा का आशीर्वाद… अन्यथा हम क्या एवं लेखनी क्या

      सहयोग के लिए धन्यवाद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *