न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।

न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं । चले जा रहे हैं ।

न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

भरी है दुपहरी बहे जा रहे हैं
न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

खड़े पीठ करके भले उस तरफ हों
मगर मंजिलों को तके जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

बसे धडकनों में मेरी इस कदर कि
अमावस को पूनम कहे जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

मेरे सामने है पलक भर दूरी
मगर रास्ते हैं बढ़े जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

पढ़ी थी बहुत सी किताबों की दुनिया
भरम आज दुनिया पढ़े जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

तबाही मचा दी वजूद-ए-कफन में
बिना जिन्दगी के जिये जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

नुमाइश लगाया है खुद की खुशी का
समेटे गमों को हँसे जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

बहुत हो चुकी अब ख्याल-ए-बयानी
परे महफिलों से चले जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

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8 Responses to न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।

  1. Arun Singh Bhadauriya says:

    Waah bhaiya Laajawab.??

  2. rohiy says:

    Mast hai.

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