तन्हा राहें और तुम

उन्ही राहों पर हम तन्हा चले हैं
कदम के निशाँ तेरे मेरे पड़े हैं ॥

वही रंग हैं और वही रूप भी है
मगर पेड़ नज़रें झुकाए खड़े है ॥

बुलाया हमें उस गहरी नदी ने
जिसके किनारे सूने बड़े है ॥

मुझे देखकर फिर रोने को आई
वो कश्ती के चप्पू टूटे पड़े है ॥

तेरे साथ की फिर महक ढूंढता है
चमन में वीराने बिखरे पड़े है ॥

तुम्हे पूछता था पीछे का पर्वत
जहाँ दिल हमारे बिखरे पड़े है ॥

अभी थोड़े लम्हे जो गुज़रे यहाँ से
हमें तन्हा पाकर सिसकने लगे हैं ॥

मेरी रूह भी अब यही पूछती है
मैं ज़िंदा हूँ क्यों जब तुमसे परे है ॥

कभी बैठो फुरसत से तभी सोचना ये
फ़िक्र क्यों तुम्हारी करने लगे है ॥

उन्ही राहों पर हम तन्हा चले हैं
कदम के निशाँ तेरे मेरे पड़े हैं ॥

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२० मई २०१६ को लिखित

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13 Responses to तन्हा राहें और तुम

  1. अभी थोड़े लम्हे जो गुज़रे यहाँ से
    हमें तन्हा पाकर सिसकने लगे हैं ….सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।गजब।

  2. बहुत सुन्दर गज़ल रचना

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      धन्यवाद शास्त्री जी आपकी टिप्पड़ी के लिए आभार ॥

  3. Deep says:

    Amazing thought bde Bhaiya…. Kya baat hai…

  4. बेहद शानदार गज़ल की प्रस्‍तुति। ”उन्ही राहों पर हम तन्हा चले हैं,कदम के निशाँ तेरे मेरे पड़े हैं” यह शेर ही आपने आप में बहुुत कुछ कह जाता है। मुझे आपकी यह रचना बहुत पसंद आई। अच्‍छी रचना के लिए आपका धन्‍यवाद।

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      इतनी तारीफ के लिए आपका आभार आज़मी भाई …
      हम उम्मीद करते हैं की भविष्य में भी सहयोग एवं प्रोत्साहन मिलेगा ॥

  5. मधुलिका says:

    बहुत अच्छा लिखते हैं आप । बहुत सुंदर रचना । मेरी ब्लॉग परआपका स्वागत है ।

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      इतनी तारीफ के लिए आपका आभार…
      हम उम्मीद करते हैं की भविष्य में भी सहयोग एवं प्रोत्साहन मिलेगा ॥

  6. madhulika says:

    बहुत अच्छा लिखते है आप । बहुत सुंदर ।

  7. सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।

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