तन्हाईयाँ

तन्हाइयों की तलाश या किसी कसक की आहट ग़ज़ल इश्क़ या खुद से तार्रुफ़

तन्हाइयों की तलाश या किसी कसक की आहट ग़ज़ल इश्क़ या खुद से तार्रुफ़

कुछ ख्वाहिशें या बेचैनियाँ

ज़माने ने कोशिश बहुत की उड़ाने की
हम वो परिंदे थे जो पिंजरे में बंद थे
कभी तो गुजारिश नवाजिश से महकेगी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है

पन्ना तो आज भी है ज़िन्दगी का लेकिन
कुछ झुर्रियों की धूल जमा है जिल्द पर
कभी तो नियामत होगी इस स्याह खत पर भी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

दिल से निकली थी कसक जिसकी तलाश में
उम्मीद थी उसे कि मुख़्तार (chosen one) जो मिले
कभी तो तार्रुफ़ (introduction) होगा चमन से माली का
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

चलते चले हैं जा रहे बेवजह रास्तों पर हम
पत्थर मिले या फूल सब कुछ क़ुबूल है
कभी तो हमसफ़र मिलेगा मेरी तन्हाइयों को भी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

चिपके हुए हैं सांप दुनियां की नज़र के
नज़रें गड़ाए हैं सभी गिद्धों के हमशकल
कभी तो छाओं आएगी हमारे वज़ूद पर भी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

========= ११ जून २०१६

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8 Responses to तन्हाईयाँ

  1. Tarun says:

    Nice!!!

  2. ram says:

    Bhai bahut khoob likhe hai

  3. Pammi singh says:

    अहसासों का बखूबी बयानबाजी..
    बढियाँ

  4. बहुत सही कहा मेरे दोस्त ….
    ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है.

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