चलन ज़िन्दगी का

पहिया बताता है
चलन ज़िन्दगी का
गड्ढों भरी
कंकड़ी, पथरीली, साधारण और शानदार
ऊंची नीची मखमली घाटियाँ
फूलों से भरी
सीखता है तमन्नाओं पर काबू करना
न बहकना न थिरकना न ही धधकना
चड़ता है कोमल राहों पर
और टूटे लम्हों पर भी
सिखाता है
खुशियों भरी राहें जल्दी कटती हैं
दुःख की धीरे
दूरी उतनी है
समझाता है कि
आवश्यक है
विश्वास, परिश्रम, निरंतरता
इस समझ के साथ कि
हम वही आ जाते है
एक चक्कर के बाद
अगले चक्कर के लिए…
============= लिखित १५ सितम्बर २०१५

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9 Responses to चलन ज़िन्दगी का

  1. dnaswa says:

    जिंदगी के चक्र को भी समझाने की कोशिश करता है ये पहिया पर इंसान समझ नहीं पाता … सोचता है अंत नहीं आएगा … गहरी रचना है …

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      आभार नासवा जी आपके बहुमूल्य समय एवं प्रत्युत्तर के लिए…

      पता नहीं अब ये पहिया किधर ले जाये हम सब को. कुछ तो जहाँ में होगा ही मंजिल के नाम पर।

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      पता नहीं अब ये पहिया किधर ले जाये हम सब को. कुछ तो जहाँ में होगा ही मंजिल के नाम पर।

      आभार नासवा जी आपके बहुमूल्य समय एवं प्रत्युत्तर के लिए…

  2. Tarun says:

    Really amazing poem!!!

  3. Pammi simgh says:

    गहन भाव एवम् विचारपूर्ण अभिव्यक्ति…
    बढिया.

  4. JAMSHED AZMI says:

    बिल्‍कुल सही कहा आपने कि पहिया बताता है चलन जिंदगी का। आदिम काल में पहिए के आविष्‍कार से ही मानव के जीवन का पहिया चलना शुरू हुआ था। बहुत खूब शानदार रचना।

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