घोड़ा… कुछ यादें बचपन की

था  मैंने  इक  सपना  देखा
सपने  में  था  घोड़ा
मटक – मटक  के  चला  कभी  वो
कभी  था  सरपट  दौड़ा …..

आँखे  उसकी  कजरारी  थी
चल  बड़ी  थी  प्यारी
परी  लोक  का  लगता  था वो
देखे  दुनिया  सारी …..

नभ  के  नीचे  मैदानों  में
चलता  और  ठुमकता
और  कभी  वो  संग  हवा  के
सरपट  बातें  करता …..

मैंने  मन  में  सोचा  था
की  उससे  बाते  करता
कभी  पूँछ  से  झुलू  उसकी
कभी  पीठ  पर  चढता …..

तभी  मेरी  माँ  ने  मुझको
ऐसे  आवाज़  लगाए
घोडा  भगा  दौड़ा  सरपट
नींद  कहाँ फिर  आई  …..

अब  मन  मैं  हैं शेष  रह  गयी
घोड़े  की  कुछ  यादें
काश  वो  मेरे  बचपन  की
खुशियां  कोई  लौटा  दे ….
काश  वो  मेरे  बचपन  की
खुशियां  कोई  लौटा  दे ….॥

Written on (08/05/2003)

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13 Responses to घोड़ा… कुछ यादें बचपन की

  1. Vivek says:

    खुशियाँ घोड़े की तरह सरपट दौड़ गयीं। अब ना घोडा लौटा , ना बचपनऔर ना खुशियाँ।
    बेहतरीन कोशिश लगे रहो।

  2. धर्म देव says:

    बचपन
    काश वो बचपन कोई लौटा दे….
    really nice Poem

  3. Anand Mishra says:

    Nice poem

  4. Tarun says:

    Beautiful

  5. krishna kumar Bhargav says:

    BACHPAN KI YAADE, AUR KHO GAYA MAI USME

  6. krishna kumar Bhargav says:

    THNX PUSPENDRA BHAI FOR TAKING US AND SHARING THESE PRICELESS LINES WITH US…

  7. Rohit says:

    Badiya hai

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