कोई तो लौटाए

लौट आते वो पंछी
आम कि छावों
वही अपना गांव
बारिश सा बनी नदिया
उसमे लहराती इठलाती नईया
पुरानी यादें
तोतले यारों कि बातें
अपनों का साथ
दूर से आती बारात
तारों भरी रात
माँ का प्यार
फिर जोर से पड़ा हाथ
मेले कि धूम में
पापा के कन्धों का साथ
ज़मीं में बोये पैसे
अब पेड़ों का इंतज़ार
पेट में खाये बीज का डर
फिर दर्द का आभास
टूटी पेंसिल के आंसू
जो दिल के बहुत थी पास
नानी की परियां और उनकी कहानी….
आज सब पाकर भी ग़मगीन हूँ
रहता है अहसास
काश मेरा बचपन भी कोई अवार्ड होता
तो लौट ही आता आज मेरे पास॥

============ लिखित १८ अक्टूबर २०१५

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2 Responses to कोई तो लौटाए

  1. बहुत अच्छा लिखते है आप । बहुत सुंदर रचना । मेरी ब्लॊग पर आप का स्वागत है ।

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      धन्यवाद और आभार संजय जी आपका हमारे ब्लॉग पर आने के लिए।

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