केवल शब्द

शब्दों को कविता बनते हमने देखा
अक्षर में खुद को गिरते हमने देखा
बनने को सौ यार यहाँ बन जाते हैं
अपनों को बेगाना बनते हमने देखा

तस्वीरों में गर झांकोगे रो जाओगे
फिर अपने उस बचपन में तुम खो जाओगे
जब दर्दनाक सी चीख सुनी एक बालक की
एक रोटी की खातिर कुत्ते से लड़ते हमने देखा
शब्दों को कविता बनते हमने देखा ….

तुम कभी यहाँ मिले तो वहां मिले एक मीठा सा सपना बन के
तुम कभी यहाँ तो वहां सुने एक सपनों सी सरगम बन के
इस दिल में हो आप बस गए इस दिल की धड़कन बन के
दूजे की महफिल में तुमको दुल्हन बनते हमने देखा …..
शब्दों को कविता बनते हमने देखा ….

Written on 05/02/1999

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13 Responses to केवल शब्द

  1. Akhil says:

    Very nice poem. New raising star.

  2. Vivek says:

    एक मानव को कवि बनते हमने देखा

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      भगवान् की कृपा और बड़े भाइयों का प्रोत्साहन.
      धन्यवाद भाई जी.

  3. धर्म देव says:

    एक रोटी की खातिर कुत्ते से लड़ते हमने देखा

    मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      धन्यवाद धर्म जी… बस जो दिखा समझा ढल गया पंक्तियों में.

  4. Richa says:

    Very good poem.. Heart touching lines.. keep it up… 🙂

  5. Souri says:

    Pushp you need to work more..
    it’s good but sensing gap..

  6. Tarun says:

    अपनों को बेगाना बनते हमने देखा…
    Rulaa ke gaya sapna Tera…nice

  7. Apurv Gangwar says:

    Fod diya bhya apne.. lovely thoughts

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