कुछ बात करें…

आओ कुछ बात करें
सुने सुनाएँ
अपने तुम्हारे दिलों की
चीखे चिल्लाएं
महसूस करें
साँसों की जुंबिश
हाथों की थिरकन
होठों की लरज़ और
माथे की शिकन
गएँ उन गीतों को जो
हमारे थे
कोसें उन लम्हों को जो
हमारे नहीं थे
आखिर सालों में मिले है हम
तो आओ कुछ बात करें ।

तुम्हे याद है वो लम्हा
अरे कैसे भूल सकते हो तुम
हाँ याद आया
पर गलती तुम्हारी थी
शायद मेरी भी
कुछ शिकयंतें भी है
तुम्हारे नाम की
मौका मिला है अब फिर से
ज़िन्दगी जीने का
साथ साथ
तो आओ कुछ बात करें ।

ढेरों पतियाँ है
एक दूसरे नाम की
लिखी थी
जुदाई के दरमियाँ
सुनानी भी तो है
बहाने है आंसू
जो हुए दफ़न
ज़माने की खातिर
उड़ा देनी है झूठी मुस्कान
फोड़ने है
दिल के छाले
निकाले अपने अरमान
तो आओ ना कुछ बात करते है …

लड़ना है हमें
मिटानी है इतनी दिनों की कसर
सिसकना भी है
करनी है ढेरों बातें
कि ना रह जाए
गिले शिकवे शिकायतें और आंसू
सब बह जाए
बचे तो बस
हमारा प्यार
तो आओ
आ भी जाओ
आँखों में आँखे और हाथो में हाथ लेकर
बैठो कुछ बात करते है
भरोसे और विश्वास से
…………..
…………..
…………..
खामोशियों से….
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२९ अप्रैल २०१६ को लिखित

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6 Responses to कुछ बात करें…

  1. मन के कोमल भावों से सराबोर एक सुन्दर रचना। मुझे बहुत पसंद आई।

  2. Satya Prakash says:

    Apratim Bhavnaye;

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