काश…

मुहब्बत में जलाकर आज भी रखे दिये हमने
कभी तू लौटकर देखे अँधेरा न मिले घर में॥

ख़ुशी मिलती है, तेरी शोहबतें हासिल नहीं मगर
तेरी यादों के हाथो सौंप दी ये ज़िन्दगी हमने ॥

छुपा के रखे है हमने सभी जज़्बात इस दिल के
की खातिर इस ज़माने के तुम्हे झूठा कहा हमने ॥

मेरे अल्फाज़ कमतर है तुम्हारे इश्क़ की खातिर
ज़ुबान को रोककर सबकुछ बताया रूह से हमने ॥

हमारी चाहतें बेड़ी नहीं है पैर की तेरे
तुम्ही से हारकर खुदको तुम्हे जीता है फिर हमने ॥

सुना है आप कहते हो लिखा क्या खूब नगमा है
हरफ को देने से पहले सहा है दर्द सब हमने ॥

वजह सोचा किये क्यों आपने छोड़ा हमें तन्हा
बसा रखा है जब तुमको नसीबो में मेरे रब ने ॥

मुहब्बत में जलाकर आज भी रखे दिये हमने
कभी तू लौटकर देखे अँधेरा न मिले घर में॥

——
१७ मई २०१६ को लिखित

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8 Responses to काश…

  1. दिगम्बर says:

    बहुत खूब लिखा है …

  2. Deepti says:

    thats a beautiful art work….. loved the first two lines immensely.

  3. Vivek says:

    good one

  4. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह गजल रची है आपने।

    • Pushpendra Singh Gangwar says:

      आभार आपका संजय जी इतने अच्छे शब्दों के लिए

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