ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

क्या हुआ? ऐ  दोस्त…

ऐ  दोस्त...तुम ऐसे तो न थे

ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

जब से तुमको जाना है, तुम ऐसे न थे ।
यूँ कैसे बिखर गए, तुम ऐसे न थे ।
देखा गम से हमेशा दूर, तुम ऐसे न थे ।

चेहरे पर भोलापन आँखों में चंचलता
न जाने कहाँ खो दी, तुम ऐसे न थे ।

तुमने ही थी सिखाया ज़िन्दगी को जीना
यूँ कैसे बेरंग बना बैठे, तुम ऐसे न थे ।

पता ही न चला किसे ख्वाब बना बैठे
खवाबो को भी भुला बैठे, तुम ऐसे न थे ।

यारो ने सीखा जिससे ज़िन्दगी का फलसफा
खुद को ही फ़ना बना बैठे, तुम ऐसे न थे ।

लूट लिया किसने हर जज़्बा जीने का
ले गए हर ख़ुशी हमारी, तुम ऐसे न थे ।

लगा लेते वो तुम्हारे नाम की हिना हाथो में
आ जाती कुछ और रौनक यार के चहरे पर
मिल जाते हमें कुछ और फलसफे जीवन के
उड़ा दिए उसने खुद तुम्हारी हंसी ही यार, तुम ऐसे तो न थे ।

ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे.


राम नरेश मिश्र

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2 Responses to ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

  1. Dharm Dev says:

    ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे….

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