कोई गिला नहीं

कोई गिला नहीं

Koi Gila Nahi

कोई गिला नहीं कि कोई जानता नहीं
अब तो मेरा नसीब भी पहचानता नहीं ।

घनघोर रात पेड़ की परछाइयों का डर
मेरे सिवा कोई भी जिसे मानता नहीं ।

अधखुली सी नींद हो कि धूप की चटख
बिखरे हुए सपनों पे नज़र डालता नहीं ।

रोते तो हैं आज भी हम दर्द से मगर
माँ के सलीके सी नज़र उतारता नहीं ।

गलतियां होती हैं मगर क्या है कायदा
मेरे पिता सा कोई मुझे डाँटता नहीं ।

आया ज़ुबाँ पे स्वाद वो नींबू आचार का
घर से चुरा के कोई हिस्सा बाँटता नहीं ।

हैं दोस्त तो बहुत मगर हैं कायदे में सब
कोई किसी कि गलतियां निकालता नहीं ।

नज़रें ही डबडबा उठी ये जानकर अभी
मुझको मेरा ही गांव अब पहचानता नहीं ।

गिनते हैं तारे रात में, कुछ याद आए पर
अब आसमाँ में कोई भी निहारता नहीं।

तनहाइयाँ हैं साथ में लग जाये न नज़र
उसके सिबा कोई भी दिल खंगालता नहीं ।

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२७ फरबरी २०१७ को लिखित

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बिन खवाब क्या जीना

ये भी कोई जीना है।

ये भी कोई जीना है।

ये जीना क्या जीना है ये भी कोई जीना है
हर पल सांसे गिनना है हर सांस में आंसू पीना है
ये भी कोई जीना है।

खोये खवाबों में है लेकिन क्या खवाबों का हमको करना
डूब न जाये डर है तो फिर क्यों मझधार में है पड़ना
तैर रही पर डूब गयी कितनी मासूम सफीना है
ये भी कोई जीना है।

चंदा और तारे तोड़ तो दे लेकिन क्या उनका करना
किसकी मांग सजायेंगे और होगा वो किसका गहना
ज़ख्म भरे जो इस दिल के ऐसा कौन नगीना है
ये भी कोई जीना है।

डूब चुके हैं हम जिनमे वे आँखे गहरे सागर है
बिरानी बस्ती हो या शोर भरा बहरापन है
तोड़ दे बस झटके में दिल ऐसा कौन करीना है
ये भी कोई जीना है।

रूठ न जाएँ हम खुद से ये शायद सोचा होगा
बस थोड़ी तकलीफे थी जब ये हाथ कटा होगा
तिल तिल मरते रहते हैं जैसे ये खून पसीना है
ये भी कोई जीना है।

सपने तो आज बहुत से हैं लेकिन कोई वजह नहीं
बीती उम्र बहुत ढूंढी पर जहाँ छुपी उस जगह नहीं
इस जीवन के सपनो को अगला जीवन क्यों जीना है
ये भी कोई जीना है।
ये भी कोई जीना है।

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२७ जनवरी १७ को लिखित

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तुम्हारी अमानत

broken-heart

ग़ज़ल जो व्यक्त करती है दर्द और इश्क़ को

दिल में दर्द बहुत है लेकर थोड़ा मरहम आ जाओ
वक़्त नहीं होगा तुम पर तुम जो है वापस ले जाओ ।

अश्क़ो की जागीर भरी है थोड़े मोती हैं बाकी
छोटा सा झोला भर लो और बाकी फेक चली जाओ।

फूल सभी मुरझाए हैं पर थोड़ी खुशबू तो है ही
हाथों को रंग लो चाहे, यादों की हवा उड़ा जाओ।

जश्न मुकाबिल क्या होगा जो आँखों से पी थी हमने
थोड़ी अब तक बची हुई है आखिरी जाम लगा जाओ।

थोड़ी साँसे बची हुई हैं दूर अँगीठी पर रक्खी
यही अमानत फ़ाज़िल सबसे जो चाहो तो ले जाओ।

कसते हैं फिकरे जो हम पर इश्क़ हमारा का क्या जाने
कुछ बदनाम हुए हम हैं, कुछ तुम हमें बना जाओ।

रश्क़ न करना हामिद हैं हम, रहम खुदा का है ज़ाहिर (प्रशंसक)
शाद तहों में छुपी हुई है चीर लो दिल को ले जाओ। (ख़ुशी)

इश्क़ हमारा वफ़ा की हद है रुसवा ना होने देंगे
शान वफ़ा की नज़रो से है नज़रें चुरा के ना जाओ।

मान लो हम हैं खुदा की रहमत यही इल्तिज़ा है बाकी
गिर्दाव तेज़ है फँसी सफीना पार लगे या डूबा जाओ॥ (भंवर, नाव)

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२५ नवम्बर २०१६ को लिखित

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