न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।

न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं । चले जा रहे हैं ।

न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

भरी है दुपहरी बहे जा रहे हैं
न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

खड़े पीठ करके भले उस तरफ हों
मगर मंजिलों को तके जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

बसे धडकनों में मेरी इस कदर कि
अमावस को पूनम कहे जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

मेरे सामने है पलक भर दूरी
मगर रास्ते हैं बढ़े जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

पढ़ी थी बहुत सी किताबों की दुनिया
भरम आज दुनिया पढ़े जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

तबाही मचा दी वजूद-ए-कफन में
बिना जिन्दगी के जिये जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

नुमाइश लगाया है खुद की खुशी का
समेटे गमों को हँसे जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

बहुत हो चुकी अब ख्याल-ए-बयानी
परे महफिलों से चले जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

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ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

क्या हुआ? ऐ  दोस्त…

ऐ  दोस्त...तुम ऐसे तो न थे

ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

जब से तुमको जाना है, तुम ऐसे न थे ।
यूँ कैसे बिखर गए, तुम ऐसे न थे ।
देखा गम से हमेशा दूर, तुम ऐसे न थे ।

चेहरे पर भोलापन आँखों में चंचलता
न जाने कहाँ खो दी, तुम ऐसे न थे ।

तुमने ही थी सिखाया ज़िन्दगी को जीना
यूँ कैसे बेरंग बना बैठे, तुम ऐसे न थे ।

पता ही न चला किसे ख्वाब बना बैठे
खवाबो को भी भुला बैठे, तुम ऐसे न थे ।

यारो ने सीखा जिससे ज़िन्दगी का फलसफा
खुद को ही फ़ना बना बैठे, तुम ऐसे न थे ।

लूट लिया किसने हर जज़्बा जीने का
ले गए हर ख़ुशी हमारी, तुम ऐसे न थे ।

लगा लेते वो तुम्हारे नाम की हिना हाथो में
आ जाती कुछ और रौनक यार के चहरे पर
मिल जाते हमें कुछ और फलसफे जीवन के
उड़ा दिए उसने खुद तुम्हारी हंसी ही यार, तुम ऐसे तो न थे ।

ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे.


राम नरेश मिश्र

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तन्हाईयाँ

तन्हाइयों की तलाश या किसी कसक की आहट ग़ज़ल इश्क़ या खुद से तार्रुफ़

तन्हाइयों की तलाश या किसी कसक की आहट ग़ज़ल इश्क़ या खुद से तार्रुफ़

कुछ ख्वाहिशें या बेचैनियाँ

ज़माने ने कोशिश बहुत की उड़ाने की
हम वो परिंदे थे जो पिंजरे में बंद थे
कभी तो गुजारिश नवाजिश से महकेगी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है

पन्ना तो आज भी है ज़िन्दगी का लेकिन
कुछ झुर्रियों की धूल जमा है जिल्द पर
कभी तो नियामत होगी इस स्याह खत पर भी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

दिल से निकली थी कसक जिसकी तलाश में
उम्मीद थी उसे कि मुख़्तार (chosen one) जो मिले
कभी तो तार्रुफ़ (introduction) होगा चमन से माली का
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

चलते चले हैं जा रहे बेवजह रास्तों पर हम
पत्थर मिले या फूल सब कुछ क़ुबूल है
कभी तो हमसफ़र मिलेगा मेरी तन्हाइयों को भी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

चिपके हुए हैं सांप दुनियां की नज़र के
नज़रें गड़ाए हैं सभी गिद्धों के हमशकल
कभी तो छाओं आएगी हमारे वज़ूद पर भी
वरना ज़िन्दगी तनहा तो कट ही रही है ॥

========= ११ जून २०१६

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