तुम्हारी अमानत

broken-heart

ग़ज़ल जो व्यक्त करती है दर्द और इश्क़ को

दिल में दर्द बहुत है लेकर थोड़ा मरहम आ जाओ
वक़्त नहीं होगा तुम पर तुम जो है वापस ले जाओ ।

अश्क़ो की जागीर भरी है थोड़े मोती हैं बाकी
छोटा सा झोला भर लो और बाकी फेक चली जाओ।

फूल सभी मुरझाए हैं पर थोड़ी खुशबू तो है ही
हाथों को रंग लो चाहे, यादों की हवा उड़ा जाओ।

जश्न मुकाबिल क्या होगा जो आँखों से पी थी हमने
थोड़ी अब तक बची हुई है आखिरी जाम लगा जाओ।

थोड़ी साँसे बची हुई हैं दूर अँगीठी पर रक्खी
यही अमानत फ़ाज़िल सबसे जो चाहो तो ले जाओ।

कसते हैं फिकरे जो हम पर इश्क़ हमारा का क्या जाने
कुछ बदनाम हुए हम हैं, कुछ तुम हमें बना जाओ।

रश्क़ न करना हामिद हैं हम, रहम खुदा का है ज़ाहिर (प्रशंसक)
शाद तहों में छुपी हुई है चीर लो दिल को ले जाओ। (ख़ुशी)

इश्क़ हमारा वफ़ा की हद है रुसवा ना होने देंगे
शान वफ़ा की नज़रो से है नज़रें चुरा के ना जाओ।

मान लो हम हैं खुदा की रहमत यही इल्तिज़ा है बाकी
गिर्दाव तेज़ है फँसी सफीना पार लगे या डूबा जाओ॥ (भंवर, नाव)

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२५ नवम्बर २०१६ को लिखित

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न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।

न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं । चले जा रहे हैं ।

न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

भरी है दुपहरी बहे जा रहे हैं
न जाने कहाँ को चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

खड़े पीठ करके भले उस तरफ हों
मगर मंजिलों को तके जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

बसे धडकनों में मेरी इस कदर कि
अमावस को पूनम कहे जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

मेरे सामने है पलक भर दूरी
मगर रास्ते हैं बढ़े जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

पढ़ी थी बहुत सी किताबों की दुनिया
भरम आज दुनिया पढ़े जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

तबाही मचा दी वजूद-ए-कफन में
बिना जिन्दगी के जिये जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

नुमाइश लगाया है खुद की खुशी का
समेटे गमों को हँसे जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।

बहुत हो चुकी अब ख्याल-ए-बयानी
परे महफिलों से चले जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं ।
चले जा रहे हैं ।

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ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

क्या हुआ? ऐ  दोस्त…

ऐ  दोस्त...तुम ऐसे तो न थे

ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे

जब से तुमको जाना है, तुम ऐसे न थे ।
यूँ कैसे बिखर गए, तुम ऐसे न थे ।
देखा गम से हमेशा दूर, तुम ऐसे न थे ।

चेहरे पर भोलापन आँखों में चंचलता
न जाने कहाँ खो दी, तुम ऐसे न थे ।

तुमने ही थी सिखाया ज़िन्दगी को जीना
यूँ कैसे बेरंग बना बैठे, तुम ऐसे न थे ।

पता ही न चला किसे ख्वाब बना बैठे
खवाबो को भी भुला बैठे, तुम ऐसे न थे ।

यारो ने सीखा जिससे ज़िन्दगी का फलसफा
खुद को ही फ़ना बना बैठे, तुम ऐसे न थे ।

लूट लिया किसने हर जज़्बा जीने का
ले गए हर ख़ुशी हमारी, तुम ऐसे न थे ।

लगा लेते वो तुम्हारे नाम की हिना हाथो में
आ जाती कुछ और रौनक यार के चहरे पर
मिल जाते हमें कुछ और फलसफे जीवन के
उड़ा दिए उसने खुद तुम्हारी हंसी ही यार, तुम ऐसे तो न थे ।

ऐ दोस्त…तुम ऐसे तो न थे.


राम नरेश मिश्र

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