चुनौती या मंज़िले

Vivekanand

चुनौती यहाँ है यहीं मंजिले भी
यहाँ के सिवा अब कहा जाऊंगा मैं॥
संवरते संवरते जो किस्मत भी बदली
अभी तक चला हूँ चला जाऊंगा मैं ॥

कभी साथ छूटे तो थमना भले हो
हिफाज़त में हमको उतरना भले हो
भले हम हो पंछी या इंसां कोई हम
अभी तक उड़ा हूँ उड़ा जाऊंगा मैं॥

अँधेरा अगर है तो है गलती किसकी
नहीं राह कोई खता बोलो किसकी
नहीं कोई डर, गर है दीपक नज़र में
अभी तक जला हूँ जला जाऊंगा मैं॥

है आवाज़ आती हमेशा तमस से
पुकारे कोई हमको व्याकुल कलश से
नहीं साथ हो कोई दरिया की लहरे
अभी तक बहा हूँ बहा जाऊंगा मैं॥

नहीं रोशनी हो सितारों में लेकिन
सुनायी दे लहरे अभी भी है मुमकिन
बहुत गीत लिखे सुने होंगे तुमने
अभी तक सुना हूँ सुना जाऊंगा मैं॥

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कोई गिला नहीं

कोई गिला नहीं

Koi Gila Nahi

कोई गिला नहीं कि कोई जानता नहीं
अब तो मेरा नसीब भी पहचानता नहीं ।

घनघोर रात पेड़ की परछाइयों का डर
मेरे सिवा कोई भी जिसे मानता नहीं ।

अधखुली सी नींद हो कि धूप की चटख
बिखरे हुए सपनों पे नज़र डालता नहीं ।

रोते तो हैं आज भी हम दर्द से मगर
माँ के सलीके सी नज़र उतारता नहीं ।

गलतियां होती हैं मगर क्या है कायदा
मेरे पिता सा कोई मुझे डाँटता नहीं ।

आया ज़ुबाँ पे स्वाद वो नींबू आचार का
घर से चुरा के कोई हिस्सा बाँटता नहीं ।

हैं दोस्त तो बहुत मगर हैं कायदे में सब
कोई किसी कि गलतियां निकालता नहीं ।

नज़रें ही डबडबा उठी ये जानकर अभी
मुझको मेरा ही गांव अब पहचानता नहीं ।

गिनते हैं तारे रात में, कुछ याद आए पर
अब आसमाँ में कोई भी निहारता नहीं।

तनहाइयाँ हैं साथ में लग जाये न नज़र
उसके सिबा कोई भी दिल खंगालता नहीं ।

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२७ फरबरी २०१७ को लिखित

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बिन खवाब क्या जीना

ये भी कोई जीना है।

ये भी कोई जीना है।

ये जीना क्या जीना है ये भी कोई जीना है
हर पल सांसे गिनना है हर सांस में आंसू पीना है
ये भी कोई जीना है।

खोये खवाबों में है लेकिन क्या खवाबों का हमको करना
डूब न जाये डर है तो फिर क्यों मझधार में है पड़ना
तैर रही पर डूब गयी कितनी मासूम सफीना है
ये भी कोई जीना है।

चंदा और तारे तोड़ तो दे लेकिन क्या उनका करना
किसकी मांग सजायेंगे और होगा वो किसका गहना
ज़ख्म भरे जो इस दिल के ऐसा कौन नगीना है
ये भी कोई जीना है।

डूब चुके हैं हम जिनमे वे आँखे गहरे सागर है
बिरानी बस्ती हो या शोर भरा बहरापन है
तोड़ दे बस झटके में दिल ऐसा कौन करीना है
ये भी कोई जीना है।

रूठ न जाएँ हम खुद से ये शायद सोचा होगा
बस थोड़ी तकलीफे थी जब ये हाथ कटा होगा
तिल तिल मरते रहते हैं जैसे ये खून पसीना है
ये भी कोई जीना है।

सपने तो आज बहुत से हैं लेकिन कोई वजह नहीं
बीती उम्र बहुत ढूंढी पर जहाँ छुपी उस जगह नहीं
इस जीवन के सपनो को अगला जीवन क्यों जीना है
ये भी कोई जीना है।
ये भी कोई जीना है।

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२७ जनवरी १७ को लिखित

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